पितृ दोष कारण एवं निवारन

पितृ दोष क्या होता है ?

पितृदोष के संबंध में ज्योतिष और पुराणों की अलग अलग धारणा है लेकिन यह शत प्रतिशत निश्चित है कि यह हमारे पूर्वजों और कुल परिवार के लोगों से जुड़ा दोष है। पितृदोष के कारण हमारे सांसारिक और ध्यात्मिक जीवन में बाधाएं उत्पन्न होती हैं। उसकी शिक्षा पूरी नही हो पाती है और अगर पूरी हो भी जाये तो वह जीविका के लिये तरसता रहता है। पितृ दोष के कारण व्यक्ति को बहुत से कष्ट उठाने पड़ सकते हैं, जिनमें विवाह ना हो पाने की समस्या, विवाहित जीवन में कलह रहना, परीक्षा में बार-बार असफल होना, नशे का आदि हो जाना, नौकरी का ना लगना या छूट जाना, गर्भपात या गर्भधारण की समस्या, बच्चे की अकाल मृत्यु हो जाना या फिर मंदबुद्धि बच्चे का जन्म होना, निर्णय ना ले पाना, अत्याधिक क्रोधी होना। इस प्रकार जातक हमेशा किसी न किसी प्रकार के तनाव में रहता है ।

पितृ दोष के कई कारण और प्रकार होते हैं। पूर्वजों के कारण वंशजों को किसी प्रकार का कष्ट ही पितृदोष माना गया है ऐसा नहीं है और भी कई कारणों से यह दोष प्रकट होता है।

ज्योतिष के अनुसार पितृ दोष क्यों होता है ?

  1. कुन्डली का नवां घर धर्म का घर कहा जाता है, यह पिता का घर भी होता है, अगर किसी भी तरह से नवां भाव या नवें भाव का मालिक, नवां भाव चन्द्र राशि से और चन्द्र राशि से नवें भाव का मालिक अगर राहु या केतु से ग्रसित है , तो सूचित करता है कि पूर्वजों की इच्छायें अधूरी रह गयीं यह पितृदोष के कारणों में आजाता है।
  2. ज्योतिष में सूर्य को पिता और मंगल को रक्त का कारक मानते हैं । जब किसी व्यक्ति की कुंडली में ये दो महत्वपूर्ण ग्रह पाप भाव में होते हैं तो व्यक्ति का जीवन पितृदोष के चक्र में फंस जाता है।
  3. जातक के लग्न और पंचम भाव में सूर्य, मंगल एवं शनि हो और अष्टम या द्वादश भाव में बृहस्पति और राहु स्थित हो तो पितृदोष बनता है और इस कारण बने पितृ दोष के कारण संतान होने में बाधा आती है।
  4. अष्टमेश या द्वादशेश का संबंध सूर्य या ब्रहस्पति से हो तो व्यक्ति पितृदोष से पीड़ित होता है,.
  5. सूर्य, चंद्र और लग्नेश का राहु से संबंध होना भी पितृदोष दिखाता है।
  6. अगर व्यक्ति की कुंडली में राहु और केतु का संबंध पंचमेश के भाव या भावेश से हो तो भी पितृदोष बनता है इसकी वजह से संतान नहीं हो पाती।

अन्य कारण :

जब परिवार के किसी पूर्वज की मृत्यु के पश्चात उसका भली प्रकार से अंतिम संस्कार संपन्न ना किया जाए, या जीवित अवस्था में उनकी कोई इच्छा अधूरी रह गई हो तो उनकी आत्मा अपने घर और आगामी पीढ़ी के लोगों के बीच ही भटकती रहती है। मृत पूर्वजों की अतृप्त आत्मा ही परिवार के लोगों को कष्ट देकर अपनी इच्छा पूरी करने के लिए दबाव डालती है और यह कष्ट पितृदोष के रूप में जातक की कुंडली में झलकता है।

यदि कोई व्यक्ति अपने हाथ से अपनी पिता की हत्या करता है, उन्हें दुख पहुंचाता या फिर अपने बुजुर्गों का असम्मान करता है तो अगले जन्म में उसे पितृदोष का कष्ट झेलना पड़ता है। जिन लोगों को पितृदोष का सामना करना पड़ता है उनके विषय में ये माना जाता है कि उनके पूर्वज उनसे अत्यंत दुखी हैं।

पितृदोष से मुक्ति के उपाय :

  1. यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में पितृ दोष है तो उसे घर की दक्षिण दिशा की दीवार पर अपने पूर्वजों का फोटो लगाकर उस पर हार-माला चढ़ाकर रोज उनका अभिवादन करना चाहिए। इससे अपने पूर्वजों का आशीर्वाद मिलेगा, वहीं दोष भी दूर होने लगेगा।
  2. शास्त्रों में कहा गया है कि मृत्यु के पश्चात पुत्र द्वारा किया गया श्राद्ध कर्म मृतक को वैतरणी पार करवाता है। पितृदोष से पीड़ित व्यक्ति को अपने पूर्वजों के निधन की तिथि पर उनका श्राद्ध कर्म संपन्न करना चाहिए। भले ही अपने जीवन में कितना ही व्यस्त क्यों ना हो लेकिन उसे अश्विन कृष्ण अमावस्या को श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। श्राद्ध में ब्राह्मणों को श्रद्धा पूर्वक भोजन कराएं। उस भोजन में पूर्वजों के पसंद की वस्तु जरूर रखें।
  3. पीपल और बरगद का पेड़ लगाएं। विष्णु भगवान के मंत्र जप, श्रीमद्भागवत गीता का पाठ करने से भी पितृ शांत रहते हैं और दोष धीरे-धीरे कम होने लगता है।
  4. दादा और पिता का अपमान न करे। अपने से बड़े लोगों का आशीर्वाद ले।
  5. अपने कुलदेवी या देवता की पूजा अवश्य करते रहें ।
  6. बृहस्पतिवार के दिन शाम के समय पीपल के पेड़ की जड़ में जल चढ़ाने और फिर सात बार उसकी परिक्रमा करने से जातक को पितृदोष से राहत मिलती है।
  7. शुक्लपक्ष के प्रथम रविवार के दिन घर में पूरे विधि-विधान से ‘सूर्ययंत्र’ स्थापित कर सूर्यदेव को प्रतिदिन तांबे के पात्र में जल लेकर, अर्घ देना चाहिए।
  8. प्रतिदिन गायऔर कुत्ते के लिए भोजन अवश्य निकालें।रविवार के दिन विशेषतौर पर गाय को गुड़ खिलाएं ।
  9. घर में भागवत का पाठ करवाएं।
  10. शुक्ल पक्ष के प्रथम शनिवार को शाम के समय पानी वाला नारियल अपने ऊपर से सात बार वारकर बहते जल में प्रवाहित कर दें और अपने पूर्वजों से मांफी मांगकर उनसे आशीर्वाद मांगे।

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